गुरुवार 14 मई 2026 - 23:09
ईरान और भारत के संबंध केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत और आध्यात्मिक रिश्ता है: डॉ. फ़रीदुद्दीन फ़रीदअस्र

नई दिल्ली में ईरान के सांस्कृतिक सलाहकार डॉ. फ़रीदुद्दीन फ़रीदअस्र ने एक विशेष साक्षात्कार में कहा कि ईरान और भारत के सभ्यतागत, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंधों का भविष्य राजनीतिक आदान-प्रदानों से कहीं अधिक गहरा है। दोनों देशों का रिश्ता हजारों वर्षों के साझा इतिहास, ज्ञान, साहित्य, आध्यात्मिकता और ज्ञान पर आधारित है, जिसे नई पीढ़ी तक पहुँचाना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के प्रतिनिधि ने इस्लामी गणराज्य ईरान के सांस्कृतिक सलाहकार, नई दिल्ली में ईरान कल्चर हाउस के प्रमुख तथा सांस्कृतिक प्रबंधन और धार्मिक कलाओं के दर्शन के प्रोफेसर डॉ. फ़रीदुद्दीन फ़रीदअस्र से ईरान और भारत के सभ्यतागत, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंधों के भविष्य के संबंध में विशेष बातचीत की। इस वार्ता में दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों, साझा सभ्यतागत विरासत, धर्म और संस्कृति की भूमिका, नई पीढ़ी की चुनौतियों तथा सांस्कृतिक कूटनीति की संभावनाओं पर विस्तृत चर्चा हुई।

डॉ. फ़रीदअस्र ने इस बात पर जोर दिया कि ईरान और भारत का संबंध केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत, बौद्धिक और आध्यात्मिक आधारों पर स्थापित एक गहरा रिश्ता है, जिसे नई पीढ़ी तक पहुँचाना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

हौज़ा: ईरान और भारत के संबंधों को आप किस दृष्टिकोण से देखते हैं? क्या यह केवल राजनीतिक संबंध है या इससे कहीं अधिक गहरा रिश्ता मौजूद है?

डॉ. फ़रीदुद्दीन फ़रीदअस्र: ईरान और भारत का संबंध केवल दो देशों के बीच राजनयिक या राजनीतिक संबंध नहीं है, बल्कि यह दो महान सभ्यताओं का ऐतिहासिक और आध्यात्मिक रिश्ता है। दोनों भूमियाँ हजारों वर्षों से ज्ञान, साहित्य, आध्यात्मिकता, कला और ज्ञान की अमीन रही हैं। इतिहास के विभिन्न कालखंडों में ईरानी और भारतीय सभ्यताएँ एक-दूसरे से इतनी प्रभावित हुई हैं कि आज भी भारत के कई क्षेत्रों में ईरानी संस्कृति की झलक स्पष्ट दिखाई देती है, जबकि फारसी भाषा और ईरानी साहित्य के विकास में भारतीय विद्वानों और कवियों की भूमिका अविस्मरणीय है।

इस्लाम के बाद भी ईरान ने सूफियाना और आध्यात्मिक अंदाज के साथ इस्लामी शिक्षाओं को भारत तक पहुँचाया, जिसने दोनों समाजों के बीच बौद्धिक और धार्मिक निकटता को और अधिक मजबूत किया। इसीलिए यदि कोई इतिहासकार ईरान या भारत की वास्तविक पहचान को समझना चाहे तो उसे दोनों के साझा इतिहास और सभ्यतागत विरासत का अध्ययन करना होगा।

हौज़ा: आपके अनुसार आज के दौर में ईरान और भारत के संबंधों की आधारभूत साझा नीतियाँ क्या हैं?

डॉ. फ़रीदुद्दीन फ़रीदअस्र: मेरे विचार में दोनों देशों के बीच कुछ बुनियादी साझी विशेषताएँ बहुत महत्वपूर्ण हैं। सबसे पहली चीज़ "सभ्यतागत पहचान" है। ईरान और भारत दोनों अपनी पहचान को केवल आधुनिक राष्ट्र-राज्य की अवधारणा तक सीमित नहीं रखते, बल्कि अपनी प्राचीन सभ्यता और ऐतिहासिक चेतना को मूलभूत महत्व देते हैं। यही कारण है कि दोनों समाजों में विभिन्न धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों के बावजूद एक व्यापक सभ्यतागत एकता मौजूद है।

दूसरी महत्वपूर्ण चीज़ राष्ट्रीय आत्मविश्वास और स्वतंत्रता है। ईरान और भारत दोनों ने उपनिवेशवाद और बाहरी दबाव का सामना किया और अपनी आंतरिक क्षमताओं पर विश्वास के माध्यम से आगे बढ़ने का प्रयास किया। दोनों देश अपनी राष्ट्रीय गरिमा, स्वतंत्रता और संप्रभुता को मूलभूत महत्व देते हैं।

इसी प्रकार धर्म भी दोनों समाजों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत में धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराएँ राष्ट्रीय पहचान का हिस्सा हैं, जबकि ईरान में इस्लामी विचार सामाजिक और राजनीतिक प्रणाली का आधार प्रदान करता है। इसलिए दोनों देश कठोर पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता के बजाय आध्यात्मिक और धार्मिक मूल्यों को महत्व देते हैं।

हौज़ा: आज की नई पीढ़ी के बीच ईरान और भारत के ऐतिहासिक संबंधों को मजबूत करने के लिए क्या उपाय आवश्यक हैं?

डॉ. फ़रीदुद्दीन फ़रीदअस्र: यह अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है, क्योंकि समय बीतने के साथ नई पीढ़ी में ऐतिहासिक चेतना कमजोर हुई है। ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने दोनों देशों के बीच भाषाई और सभ्यतागत संबंधों को नुकसान पहुँचाया, और बाद के राजनीतिक हालात ने भी दूरियाँ बढ़ाईं। इसलिए अब आवश्यक है कि हम केवल अतीत की यादों पर अकतफा न करें, बल्कि आधुनिक माध्यमों के द्वारा इस संबंध को नई पीढ़ी तक पहुँचाएँ।

डिजिटल मीडिया, सांस्कृतिक कार्यक्रम, साझा साहित्यिक समारोह, फिल्में, संगीत, विश्वविद्यालय संबंध और छात्रों के आदान-प्रदान के माध्यम से युवाओं को इस साझा सभ्यतागत विरासत से जोड़ा जा सकता है। हमें फ़ारसी, हिंदी और संस्कृत भाषाओं के विभागों को मजबूत करना होगा और दोनों देशों के विद्वान एवं साहित्यिक हलकों के बीच स्थायी संबंध स्थापित करने होंगे।

हौज़ा: आप सांस्कृतिक कूटनीति को ईरान और भारत के भविष्य के संबंधों में कितना महत्वपूर्ण मानते हैं?

डॉ. फ़रीदुद्दीन फ़रीदअस्र:मेरी दृष्टि में सांस्कृतिक कूटनीति ही वह मार्ग है जो दोनों देशों को लंबी अवधि तक एक-दूसरे के करीब रख सकता है। राजनीतिक संबंध समय और परिस्थितियों के साथ बदलते रहते हैं, लेकिन सभ्यता, कला, साहित्य और आध्यात्मिकता पर आधारित संबंध अधिक स्थायी होते हैं।

हमें ऐसी सांस्कृतिक कूटनीति की आवश्यकता है जो राजनीतिक मतभेदों को सांस्कृतिक सेतु में बदल दे। उदाहरण के तौर पर साझा फिल्म परियोजनाएँ, साहित्यिक सम्मेलन, सूफीवादी संवाद, ललित कलाओं की प्रदर्शनियाँ और अंतरधार्मिक वार्ता दोनों देशों के बीच विश्वास और निकटता को बढ़ा सकती हैं।

मैं समझता हूँ कि ईरान और भारत को दुनिया के सामने केवल राजनीतिक शक्तियों के रूप में नहीं, बल्कि दो महान सभ्यतागत केंद्रों के रूप में प्रस्तुत होना चाहिए, क्योंकि वास्तविक रिश्ता राजनीति नहीं, बल्कि सभ्यता, आध्यात्मिकता और मानवीय मूल्य हैं।

हौज़ा: अंत में आप ईरान और भारत के भविष्य के संबंधों के बारे में क्या संदेश देना चाहेंगे?

डॉ. फ़रीदुद्दीन फ़रीदअस्र: मैं यह समझता हूँ कि ईरान और भारत का संबंध इतिहास के किसी एक काल या किसी सरकार तक सीमित नहीं है। यह एक ऐसा सभ्यतागत रिश्ता है जो हजारों वर्षों से स्थापित है और आगे भी स्थापित रहेगा। यदि हम अपने साझा इतिहास, संस्कृति, साहित्य, आध्यात्मिकता और मानवीय मूल्यों को आधार बनाएँ तो दोनों देश न केवल अपने संबंधों को मजबूत बना सकते हैं, बल्कि दुनिया के सामने सभ्यतागत सद्भाव और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की एक सुंदर मिसाल भी प्रस्तुत कर सकते हैं।

जवाहरलाल नेहरू ने ताजमहल को "भारतीय शरीर में ईरानी आत्मा" कहा था, उसी प्रकार ईरान और भारत का संबंध भी दो शरीरों में एक साझा सभ्यतागत आत्मा के समान है।

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